मां की सीख से डॉक्टरी सेवा में भरी उड़ान

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डॉ. नागेंद्र सिंह

मेरी मां। गंगा देवी। हर पल रहती जेहन में मौजूद। हर समय उससे मिली सीख रहती याद। लेकिन आज जब पितृपक्ष के पावन और पवित्र अवसर पर उसे याद करने की याद दिलाई गई तो मन प्रसन्नचित हुआ-प्रफुल्लित हुआ। इसका वर्णन करना मेरे लिए कठिन है। मेरी मां का जन्मदिन 3 फरवरी 1917 और देहावसान की तिथि 21 जनवरी 1997 है।


बेशक एक एमबीबीएस डॉक्टर के रूप में अपनी सेवा से मुझे संतोष की अनुभूति होती है। समाज के लोग मुझे एक सफल सर्जन के रूप में प्रतिष्ठा देते हैं और गरीब गुर्गों की सेवा कर मैं खुद में संतोष की अनुभूति करता हूं तो हमारी सेवा से संतुष्ठ होने वाले लोग एक डॉक्टर के रूप में मुझे विभिन्न विशेषणों से नवाजते हुए मेरा मान-सम्मान बढ़ाने का काम करते हें। सच कहूं तो इन सबका श्रेय मेरी मां गंगा देवी को जाता है। आज समाज की सेवा के लिए मैं जो कुछ बन सका हूं यह उसी के पुण्य प्रताप का प्रतिफल है।


मेरी मां एक ऐसी महिला थी जिसके रोम-रोम में परोपकारिता एवं सेवा की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। बिहार के दरभंगा जिले के कमतोल थानाअंतर्गत पनिहारा मेरा पैतृक गांव है। हमारा बचपन वहीं बीता था। उस जमाने में अकाल का साया पड़ता था और बाढ़ भी अपनी विभीषिका की मार हर साल दे दिया करती थी। पर्याप्त खेत-बधार रहते हुए भी इन दोनों कारणों से पारिवारिक जीवन-यापन को संचालित करने में कई तरह की चुनौतियों को सामना करना पड़ता था।


लेकिन हे मेरी मां। वो तो अद्भुत थी कभी भी हम भाई-बहनों समेत परिवार के अन्य सदस्यों को किसी तरह की समस्या का भान नहीं होने देती थी। वह चरखा काटकर हम पांच भाई-बहनों का भरण-पोषण करती रही लेकिन एक बार भी यह भान नहीं होने दिया कि पढ़ाई-लिखाई के रास्ते में रूकावट आयेगी। उसी ने मुझे पढ़ा-लिखाकर एमबीबीएस डॉक्टर बनाया।


डॉक्टर की पढ़ाई पूरा करने के बाद मैंने तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के बहरागोड़ा प्रखंड में सरकारी डॉक्टर के रूप में नौकरी की शुरूआत की। डॉक्टरी में सर्जरी में मैंने विशेषज्ञता हासिल की और मुख्य रूप से सर्जन के रूप में लोगों का इलाज करने लगा।


बहरागोड़ा में पदस्थापन के दौरान मेरी मां दरभंगा के गांव से वहां आई थी। मैं मरीजों को देख रहा था। सभी ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे। कपड़ा-लता से लग रहा था आर्थिक चुनौतियों से जूझने वाले लोग हैं। मेरी मां उनसे पूछने लगी आपके पास पैसा है कि नहीं?


कुछ दिनों तक मेरे साथ रहने के बाद बहरागोड़ा से जब मां गांव लौटने लगी तो मुझसे कहा-एक सीख देकर गांव लौट रही हूं। जीवन भर इसे याद रखना। एक डॉक्टर के रूप में जब किसी भी मरीज का इलाज करना तो मेरी इन बातों को याद भी करना और इनपर अमल भी करना।

मेरी मां ने कहा-कोई भी मरीज इलाज के लिए आएगा तो उससे इलाज या ऑपरेशन शुरू करने के पहले पैसा कभी नहीं लेना। अच्छा होने पर या छुट्टी के समय मरीज जो दे, वही ले लेना। पैसा नहीं रहने पर नि:शुल्क इलाज या ऑपरेशन करना। यदि मरीज यह शुल्क देने में सक्षम नहीं रहे तो उसे सहर्ष विदा करना। हो सके तो, अपनी ओर से कुछ मदद भी कर देना।


मेरी मां ने आगे कहा था कि याद रखना पवित्र भाव से किया गया कोई भी कार्य अच्छा परिणाम ही देता है। तुम नेकी करोगे तो सबकुछ मिलेगा। यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और पैसा भी।


आज मैं जब भी किसी मरीज का इलाज या ऑपरेशन करता हूं तो मां की इस सीख को नमन करते हुए इसपर अमल भी करता हूं। मां से मिली यह आदर्श सेवा भाव आज मेरे कर्तव्य पथ का मूल मंत्र बन चुका है। मां से मिली इस सीख को उसका आदेश भी मानता हूं और मंत्र भी और इसी के सहारे मरीजों की सेवा करता हूं और आगे भी करता रहूंगा।


मां का आशीर्वाद पूरे परिवार के लिए प्रेरणादायक है। आज मैं जो कुछ हूं यह मेरी मां के आशीर्वाद का प्रतिफल है।
मां, तुझे कोटि-कोटि प्रणाम।
पितृ पक्ष में तुझे भावभीनी श्रद्धांजलि।

तुम्हारा ही बेटा

नागेंद्र


(डॉ. नागेंद्र सिंह झारखंड के औद्योगिक शहर जमशेदपुर के मानगो डिमना रोड स्थित गंगा मेमोरियल अस्पताल के मार्गदर्शक हैं। हर साल अपनी मां की याद में दो महीने तक नि:शुल्क ऑपरेशन शिविर का संचालन करते हैं अब तक 50 हजार से ज्यादा खासकर गरीब आदिवासियों का ऑपरेशन कर चुके हैं। अपनी दानशीलता के लिए इनकी खास पहचान है। पितृ पक्ष के मौके पर डॉ. नागेंद्र सिंह ने अपनी मां के प्रति अपनी भावनाओं सनातन सिंधु डॉट कॉम के साथ साझा किया है।)

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