कविता संग्रह अंजुरी भर गीत : प्रेम और प्रकृति की पुष्पांजलि

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पुस्तक समीक्षा

दिव्येंदु त्रिपाठी

अंजुरी भर गीत। जमशेदपुर के गीतकार -कवि वसंत जमशेदपुरी
(मूलनाम मामचंद अग्रवाल) का पहला गीत-संकलन है जिसमें कुल एक सौ गीतों का संकलन हुआ है। जैसा कि सभी जानते हैं कि वसंत जमशेदपुरी छंदबद्ध रचनाओं में अच्छी गति रखनेवाले कवियों में हैं और वे अपनी काव्य -रचनाओं को मात्रा, गति,यति आदि की कसौटी पर परखने के हिमायती भी हैं। आज जहां छन्दमुक्ति की चाह काव्यमुक्ति की उड़ान भर रही है, वही कविवर वसंतजी छन्द के उपवन में गीतों के वसंत का सौरभ बिखेर रहे हैं। आप हमारे शहर के उन अल्पगण्य और सुदुर्लभ सुकवियों में हैं जो छन्द- आग्रही हैं और काव्य के शास्त्रीय अनुशासन के समर्थक भी।


इस गीत-संकलन का प्रारंभ भगवती सरस्वती की वंदना से हुआ है जहाँ कवि ने उनसे अक्षरों , शब्दों और छंद में विराजने की प्रार्थना की है तथा वह शोषितों की पीड़ा को जता सके ऐसी गेयता की याचना की है। फिर उन्होने ईश्वर और उसके सृजन को नमन किया है। उसके बाद शेष गीतों का क्रम प्रारंभ होता है।
प्रस्तुत संकलन के गीत वैसे तो विविध भावों से ओतप्रोत हैं लेकिन उनमें श्रृंगार और प्रकृतिप्रेम सर्वप्रमुख है। वास्तव में देखा जाए तो इन गीतों में प्रेम प्रकृति का साहचर्य पाकर ही अभिव्यक्त हुआ है। उनमें सर्वत्र वन-उपवन, विविध ऋतु, नदियाँ-झरने, ,पशु-पक्षी , पर्व और उत्सव आदि व्यंजक -माध्यम बने हुए हैं–
हिरनी जैसी चंचल चितवन
निर्झर जैसा तेरा यौवन।
मुक्त गगन के इस पंछी को
सजनी कभी लगाम न देना ।। (39)

++++
तुम हहराती-सी सरिता हो, बांह पसार सागर मैं (11)
कवि का प्रेम पग-पग पर प्रकृति में रमता जाता है। कहीं-कहीं प्रेयसी और प्रकृति एकाकार हो जाते हैं। कहीं प्रेयसी प्रकृति लगती है तो कहीं प्रकृति ही प्रेयसी लगने लगती है। दोनों समवायी संबंधवाले हो जाते हैं। उस प्रेयसी का रूप कवि को स्निग्ध चांदनी -सा और उसका स्नेह रेगिस्तान के कूप -सा उद्भावित होता है।वह कहीं सावन की हरियाली है तो कहीं वह गंगा की निर्मल धारा।
कवि केवल अपने मन की ही बात नहीं करता बल्कि अपनी प्रेयसी के भावों को भी अपने शब्दों से श्रृंगारता है –
पिया तुम्हारी सुखकर बातें, जैसे सावन का बादल (25)
रे पावस तुझे न आना था। बिरहिन को नहीं सताना था। (37)
तेरी साँसों की खुशबू से, मन महका जाए।
मुझे संभालो प्रियवर मेरा तन बहका जाए।। (68)
कवि ने पावस और वसंत दोनों के प्रति कई गीत लिखें हैं। वसंत के गीतों में मादकता और ताजगी है और प्रकृति का मनोहारी चित्रण है -आंगन में द्वार में
बाग में,बहार में
रिश्तों में,प्यार में
प्रेम बरसायो है। (13)

वसंत के आगमन होनों पर प्रकृति की रंगबिरंगी छवि कवि को मोहित करती है।सरसों का पीलापन,पलाशों का खिलना,भौंरों का गुंजन -यै सब कवि के लिए उद्दीपन का काम करते हैं और वह शिवरिपु (मदन) से निपीडित हो जाता है। वही पावस विरहिन को सताने लगता है।वह कहती है कि पावस आषाढ़ को भले ले आता लेकिन सावन को नहीं लाना था और मोर को भले ले आता मगर पपीहे को नहीं लाना था। कहीं कहीं प्रेयसी आंंखमिचौनी का खेल करती दिखती है और कवि को सताने में ही उसे अधिक आनंद आता है।ऐसा लगता है मानो आँखमिचौनी का यह खेल चिरकाल से चला आ रहा हो।
कवि की लेखनी केवल प्रेमाभिव्यक्ति तक ही नहीं रुकती बल्कि सामाजिक यथार्थ की ओर भी बढती है। मजदूरों का श्रम, मेहनतकश लोगों की पीड़ा,नेताओं के काले कारनामें,कन्या भ्रूण हत्या, देश पर बलिदान होनेवाले वीर जवान, किसान आदि काफीकुछ इस कृति में अभिव्यक्त हुए हैं। कवि कवियों से सच्चाई को अभिव्यक्त करने का निवेदन करता है-
एक बात बताओ कविवर

कब मन उद्गार लिखोगे (55)
गीत संख्या- 61 में कवि माता लक्ष्मी से विनती करता है कि वे सबके घर समान रूप से पधारे, कोई भूखा ना रहे, किसान खुदकुशी ना करें, सबका घर -आंगन रौशन हो और औरतों की इज्जत तार-तार न हो।
कवि का कहना है कि धरती पर जब जब प्रेम की कमी हुई है और मानव नफरत डूबा है तब-तब मानवता का ह्रास हुआ है और महाभारत जैसी घटनाएं घटित हुई हैं। कवि मीरा और शबरी के जैसे प्रेम हिमायती है।
दीवाली और दीप पर कवि ने अपने भाव रखें हैं। भाव यह है कि सबके घर दीपावली हो। दीप ऐसा जले कि अंधियारे का कहीं लेश न रहे।
विश्व समूचा अवध बन गया
घर-घर देखो दीप जले।
कवि को भारत और भारतीयता से प्रबल अनुराग हैं। सारे प्रतिमान भारत के इतिहास भूगोल और संस्कृति से लिए गए ।कवि की नायिका भारतीय संस्कृति के परमाणुओं से बनी है।वह भारत की नदियों में नहाती है,भारत के मौसमों में पगी हुई भारत के वन-उपवन में विचरण करती है ,भारत के त्यौहारों में वह रमती है। उसकी बाहें पद्मावत सी तथा अधर गीत गोविंद के सदृश हैं।कवि सच्चे अर्थों में भारतीय प्रेम का गवैया है ।उसके प्रेम में मादकता है लेकिन मांसल विलास की वासना नहीं।
कवि अपने पुरखों की भूमि राजस्थान को सगर्व याद करता है।वहाँ की मिट्टी की खुशबू को वह महसूस करता है।वहाँ के तीर्थों(सालासर,मेंहदीपुर), लोकमातृकाओं (जीण माता,करणी माता,राणी सती माता) तथा राष्ट्ररक्षक वीरों(महाराणा प्रताप, गोरा,बादल) तथा वीर क्षत्राणियों को नमन किया है।
कविवर को लिखने से विशेष अनुराग है। वे स्थान-स्थान पर लिखने की चर्चा करते हैं-
1)मन के कोरे कागज पर प्रियवर ने गीत लिखा।…….जीवन संगीत लिखा।
2)आज किसी की पीडाओं को गीतों का श्रृंगार लिखूंगा।
3)प्रिये तुम्हारे अधर रसीले इनपर अपने गीत लिखूँ।
4)कब मन का उद्गार लिखोगे
5)कैसे मैं नवगीत लिखूँ अब
6)रंग हिना लेकर उर पर,प्रियवर तेरा नाम लिखूँ ….चारों धाम लिखूँ।
यह संकलन एक विशुद्ध गीत -संग्रह है। गीत के तीनों विशेष लक्षण इसके गीतों में समाहित हैं
1)संक्षिप्तता 2)वैयक्तिकता 3)गेयता
शब्द -विधान सहज है।तत्समता और तद्भवता का विशेष समागम हुआ है। हालाँकि अभिधा की प्रधानता है फिर भी कहीं कहीं लाक्षणिकता -सी भी दृष्टिगत हो जाती है। शब्दों में कोमलता है। गीतों में लालित्य देने के लिए कोमल पद-विन्यास विशेष भूमिका निभाते हैं। वाक्यांत में रे या सा जैसे अंत गेयता को सुखद बनाते है।इन गीतों के शीर्षक उल्लिखित होते तो अच्छा होता क्योंकि अनुक्रम में शीर्षक दिए गए हैं । (शायद कवि ने कुछ नया प्रयोग करना चाहा हो। )
कवि का प्रयास प्रशंसनीय है। गीत-लेखन की परंपरा में इन्हें नीरज,नेपाली,अनजान,आनंद बक्शी ,शैलेन्द्र,समीर की धारा से जोडा जा सकता है। शेष इनकी साधना स्वत: निर्धारण करेगी।
कवि वसंत की लेखनी रचती गीत अपार।
मन पुलकित सबका करे ,मन में प्रेम बयार।।
अँजुरी भर गीत(गीत संग्रह)
वसंत जमशेदपुरी
अनुसंधान प्रकाशन, गाजियाबाद।
कीमत : 150 रुपये
आवरण -सुनीता पांडेय सुरभि

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