रत्नी देवी के श्राद्ध कर्म में दिखी माता-पिता के दिये संस्कारों की अहमियत, अनेक दिग्गजों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

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चंद्रदेव सिंह राकेश

जब समाज में आदर व प्रतिष्ठा के नजरिए से  किसी माता-पिता की पहचान उसकी संतान के जरिए होने लगे तो समझिए कि उसका जीवन सफल हो गया है. उस माता-पिता ने अपनी संतान में संस्कार के जो बीज बोये उसका सुफल पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहेगा. अच्छे संस्कार माता-पिता से होते हुए बच्चों तक जाते ही हैं.
जमशेदपुर के साकची राजेंद्र नगर में आयोजित समाजसेविका व धर्मपरायण महिला रत्नी देवी (पति स्व.काशीराम बधान) के श्राद्ध कर्म में इस सच्चाई का जीवंत रूप देखने को मिला. उनके दोनों पुत्रों संजीव व राजीव ने श्रद्धा व आदर के साथ सारे कर्मकांड समेत अन्य कार्यों को पूरा करते हुए अतिथियिों का जिस आत्मीयता के साथ स्वागत-सत्कार किया, उससे साफ नजर आया कि माता -पिता ने संजीव व राजीव को अच्छे संस्कार दिए हैं.
संजीव व राजीव दोनों की सामाजिक सहभागिता कितनी व्यापक है, यह उनकी माताजी के श्राद्धकर्म में दिखा भी. संंजीव दवा कारोबार के साथ साथ समाजसेवा से भी पूरे मनोयोग के जुटे हैं तो राजीव झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन से लंबे समय से जुडे हैं.
समाज के हर वर्ग के दिग्गज पहुंचे थे श्राद्ध कर्म में शामिल होकर रत्नी देवी को श्रद्धांजलि देने के लिए. इनमें प्रमुख थे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता, विधायक विरंची नारायण, पूर्व विधायक कुणाल षाड़ंगी, प्रदेश भाजपा के पूर्व प्रवक्ता अमरप्रीत सिंह काले, कांग्रेस नेता संजय पांडेय, समाजसेवी रमेश अग्रवाल, प्रशासनिक अधिकारियों सुनील कुमार, गणेश कुमार व  सत्यवीर रजक, क्रिकेटरों में  सौरभ तिवारी, विराट सिंह, अनुकूल राय, कुमार देवव्रत, सभी जिलों के झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारी-सदस्य, जेएससीए के अध्यक्ष संजय सहाय, महासचिव देवाशीष चक्रवर्ती, पूर्व उपाध्यक्ष अजय नाथ सहदेव, पूर्व सेक्रेटरी बॉबी वर्मा समेत इस संगठन के कई सदस्य व आजाद नगर थाना पीस कमिटी के सेक्रेटरी मुख्तार आलम  शामिल थे.   इनके अलावा मारवाड़ी समाज, राजस्थान मैत्री संघ, वनवासी कल्याण केंद्र, सिंहभूम चैम्बर ऑफ  कॉमर्स, मारवाड़ी युवा मंच ,बंगाली समाज, बिहारी समाज, गुजराती समाज, सिख समाज व केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन से जुड़ी अनेक हस्तियां भी पहुंची और रत्नी देवी को श्रद्धांजलि अर्पित की.  
सभी प्रमुख लोगों ने रत्नी देवी से अपने जुड़ाव को याद करते हुए उनसे मिली सीख को याद किया. इन लोगों का कहना था कि  आज यहां आकर यही देखने व समझने को मिल रहा है कि माता-पिता स्वयं मर्यादित और संस्कार वाला जीवन जियें, तभी बच्चों को नैतिक धार्मिक संस्कार मिलते हैं. वाकई माता-पिता ही बच्चों को संस्कारों की शिक्षा देने वाले प्रथम गुरु होते है. संस्कार से ही मर्यादा वाला जीवन बन सकता है.
रत्नी देवी जी की आत्मा आज इस तथ्य को रेखांकित कर समाज को इसका अनुसरण करने का संदेश दे रही है.
सादर नंमन
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